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TAMAS SE AZAADI (तमस से आजादी) in Hindi

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तमस से आजादी :- हेमलता चहकती हुई पूरे घर मे घूम रही थी। उसके कॉलेज का दोस्त शिवशंकर अपने परिवार के साथ हेमलता से मिलने आ रहा था। मिलना तो एक औपचारिकता ही थी। शिवशंकर को और उसके परिवार को हेमलता बेहद पसंद थी। हेमलता की मम्मी भानुमती हालांकि बराबर ये ही कह रही थी कि एक बार पंडित राधेजी से बात कर लूं। लेकिन हेमलता की बड़ी बहन अनु ने मम्मी की बात को तूल नहीं दिया और शिवशंकर को आमंत्रित कर लिया था क्योंकि शिवशंकर अच्छी खासी सरकारी नौकरी में था और परिवार भी बेहद जाना-माना था। हेमलता के गोरे गाल शर्म से गुलाबी हो रहे थे, शिवशंकर अपने मम्मी-पापा के साथ पहुंच गया था। थोड़ी देर बातचीत हुई और फिर शिवशंकर की मम्मी बोली, ‘हमारे पास सब कुछ है, बस एक बेटी की कमी है जो हेमलता के आने से पूरी हो जाएगी। हेमलता की दीदी बोली, ‘आंटी जी हमें भी हेमलता के लिए ऐसा ही संस्कारी परिवार चाहिए था।’ शिवशंकर की मम्मी जैसे ही हेमलता के गले मे सोने की चेन पहनाने लगी कि भानुमती जी बोल उठीं, ‘रुकिये दीदी, माफ कीजिये जब तक पंडितजी से मैं जन्मपत्री ना मिलवा लूं, मैं कोई रस्म नहीं कर सकती हूं।’ शिवशंकर के माता-...

Lavanya Ka Ghar ? (लावण्या का घर ?)

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  लावण्या रंग में साक्षात सौंदर्य की देवी प्रतीत होती थी। गौर वर्ण, श्यामल केश,सुराही जैसी गर्दन और चाल ऐसी लुभावनी की हिरणी भी शर्मा जाए। पाक कला में दक्ष लावण्या ,पढ़ाई में सामान्य रही थी। उसकी माँ कौशल्या देवी ने उसे बड़ी ही सादगी से पाला था। कभी लावण्या आधुनिक परिधान पहनने के लिए कहती तो कौशल्या देवी तुरंत टोक देतीं “लावण्या बाबुल के घर लड़की सादा ही रहतीं हैं, अपने घर जाकर चाहे जितना फैशन करना” लावण्या के कॉलेज से लड़कियाँ एजुकेशनल टूर पर जा रहीं थीं उसने भी माँ से अपने जाने के विषय में पूछा तो माँ का जवाब आया “लावण्या मुझे विवाह से पूर्व लड़की का यूँ घूमना -फिरना पसंद नहीं, जितना भारत भ्रमण करना हो अपने घर जाकर करना” लावण्या उदास होकर स्वयं से पूछती “क्या यह मेरा घर नहीं है?” लावण्या को कॉलेज के एक फंक्शन में गायत्री देवी जो कॉलेज की ट्रस्टी थीं, ने देख लिया और अपने बेटे मोहित के लिए पसंद कर लिया। विवाह का प्रस्ताव लावण्या के घर पहुंचा तो लावण्या की माँ अत्यंत प्रसन्न हुईं। आखिर इतना धनाढ्य परिवार जो मिला था। आखिरकार लावण्या का विवाह मोहित से हो गया। सुहाग कक्ष में ही ...

Ramaa Ka Antadwandh (रमा का अंतर्द्वंद्ध )

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रमा जैसे ही घर के लिए निकलने ही लगी थी उसका फ़ोन बज उठा। दूसरी तरफ उसकी मां थी, वह रोते रोते कह रहीं थी –बेटा कहां हो, जल्दी से घर आ जाओ, तुम्हारे पापा को पता नहीं क्या हो गया है। उन्हें छाती में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है और अचेत से हो गए हैं, बदन भी बिलकुल ठंडा पड गया है। बस तू जल्दी से आजा, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, शायद अचानक दिल का दौरा पड़ा है। मैं अकेली हूं क्या करूं ? रमा के तो पैरों तले से मानो ज़मीन ही निकल गयी । कई दिनों से पापा से मिलने का कार्यक्रम बना रही थी किन्तु व्यस्तता के चलते हर रविवार निकल जाता था घर के काम काज निपटाते। रमा एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर पद पर कार्यरत थी। रमा अपने मां बाप की इकलौती बेटी थी और इसी शहर में ही रहती थी, फिर भी कई बार महीने बीत जाते थे अपने मां- बाप से मिले हुए। फोन पर तो दिन में कई बार बात हो जाती थी । उसके अपने दो बच्चे थे और घर में सास ससुर थे, भरा पूरा परिवार था । रविवार के दिन उसे सारे सप्ताह के कार्य निपटने होते थे, बच्चों की ज़रूरतों को पूरा करना, घर का रख रखाव करते दिन कहां उड़ जाता था, पता ही नहीं लगता था। अगर कोई मेहमान आ गए तो...